महर्षि कश्यप मुनि द्वारा बनवाया गया था मां तारा मंदिर ?

गया के टिकारी शहर के केसपा गाँव मे स्थित माँ तारा देवी की प्रसिद्ध मंदिर है. यह मंदिर धार्मिक और लोक आस्था का शक्तिपीठ माना जाता है. केसपा गाँव महर्षि कश्यप मुनि का साधना स्थल था एवं माता तारा रानी कश्यप ऋषि के अराध्य देवी थी।

कहा जाता है कि महर्षि कश्यप मुनि द्वारा ही माता रानी का मंदिर बनवाया गया था. आज भी वही पुराना मंदिर में माता रानी विराजमान है।

केसपा गांव यह नाम महर्षि कश्यप मुनि से जुड़ा हुआ है पहले इस गांव का नाम कश्यप पुरी था फिर बिच मे बहुत दिन तक कश्यपा रहा। बाद में कश्यपा नाम धीरे-धीरे केसपा में तब्दील हो गया।

गया जिला से लगभग 37 किमी और टिकारी से 12 किमी. उतर अवस्थित प्रसिद्ध मां तारा देवी का पूजा-अर्चना करने भक्तजन वर्ष भर आते रहते हैं।

एक समय समुद्र मंथन आरम्भ हुआ और भगवान कच्छप के एक लाख योजन चौड़ी पीठ पर मन्दराचल पर्वत घूमने लगा. समुद्र मंथन से सबसे पहले जल का हलाहल विष निकला. उस विष की ज्वाला से सभी देवता तथा दैत्य जलने लगे, उनकी कान्ति फीकी पड़ने लगी और मूर्क्षित होने लगे थे. इस पर सभी ने मिलकर भगवान शंकर की प्रार्थना की. उनकी प्रार्थना पर महादेव जी उस विष को हथेली पर रख कर उसे पी गये किन्तु उसे कण्ठ से नीचे नहीं उतरने दिया. उस कालकूट विष के प्रभाव से शिव जी का कण्ठ नीला पड़ गया और वह अर्ध निद्रा में हो गए. अब क्या होगा. उस समय पुरे जगत में चारों ओर हाहाकार मच गया की महादेव को क्या हो गया. तभी मां तारा प्रकट हुईं. माता आईं और छोटे बालक की तरह महादेव को गोद में उठा लिया. फिर मां तारा ने महादेव को अपना दूध पिलाया. दूध पीते ही महादेव की अर्ध निद्रा टूट गई और महादेव ने मां तारा को प्रणाम किया। इसतरह मां तारा महादेव शिव शंकर की भी मां हो गईं।

आठ फीट ऊंची है मां तारा की प्रतिमा-

केसपा मंदिर में मां तारा की पौराणिक मूर्ति आठ फीट से भी ऊंची है. इस मूर्ति के सामने खड़े होकर नवरात्र में जो हाथ जोड़ लेता है, माता उसके सारे दुख हर लेती हैं.

मंदिर में लिखे लिपि को आज तक नहीं पढ़ा जाना –

मां तारा की मूर्ति पर किसी लिपि में बहुत कुछ लिखा हुआ है, पर इसे आजतक नहीं पढ़ा जा सका है. पुरातत्वविदों को इस मंदिर की दीवारें भी बहुत कुछ बता सकती हैं. यहां की दीवारें चार फीट से ज्यादा चौड़ी हैं.

मंदिर की बनावट-

कच्ची मिट्टी और गदहिया ईट से निर्मित मंदिर के गर्भ गृह की दीवार 4-5 फीट मोटी है. गर्भ गृह की सुन्दर नक्काशिया मंदिर में प्रवेश करने वाले श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है. गर्भ गृह में विराजमान मां तारा देवी की वरद हस्त मुद्रा में उतर विमुख 8 फीट उंची आदमकद प्रतिमा काले पत्थर की बनी है. मां तारा के दोनों ओर दो योगिनी खड़ी है. मंदिर के चारों ओर एक बड़ा चबूतरा है।

पुरातत्ववेत्ताओं का मंदिर भ्रमण –

मां तारा देवी के मंदिर को देखने और सर्वे करने तीन विदेशी पुरातत्ववेत्ता केसपा आ चुके है.

1. सन 1812 में स्कॉटलैंड के मि. फ्रांसिस बुचनन- भूगोलिक, जीव विज्ञानी और वनस्पति-विज्ञानिक,

मि. फ्रांसिस बुचनन केसपा और मां के मंदिर में 4 फरबरी 1812 आये थे. वह लिखते है की उस समय मंदिर मिटटी, ब्रिक्स और स्टोन की बनी हुई थी. मंदिर में बहुत से चित्र दिवार पर बनी हुई थी और मंदिर के दरवाज़े के पास बहुत सी चित्र नष्ट हो चुकी थी. मंदिर के दीवार पर प्लास्टर नहीं किया हुआ था. उस समय वहां पर तीन पुजारी पूजा कर रहे थे. मैंने जब उनलोगों से पूछा की मंदिर कब बना है तो उनमें से एक पुजारी गुस्सा हो कर कहा की यह मंदिर सतियुग में बना है. इसके बाद मैंने विवेक पूर्ण तरीके से मंदिर क देखा तो उनसे आगे पूछना बेकार समझा की मंदिर कब बना है.

फ्रांसिस बुचनन बताते है की मंदिर के बीच में मानव आकृति में माँ तारा की प्रतिमा सर से लेकर पैर तक एक साड़ी में ढकी हुई खडी थी. मै यह समझा की भगवान वासुदेव स्त्री के कपड़े में सजे हुए है. मैंने इस बारें में पूछना उचित नहीं समझा. यह जगह बहुत बड़ा धार्मिक आस्था का जगह है.

2. सन 1872 में अमेरिकन-भारतीय इंजिनियर, पुरातत्ववेत्ता, फोटोग्राफर मि. जोसेफ डेविड बेलगर, माँ के मंदिर आये.

बेलगर के अनुसार यह मंदिर मध्यकालीन युग 9 वीं, 10 वीं शताब्दी में बना है, वह आगे लिखते है गांव के चारो तरफ मंदिर है जो की प्राचीनतम है भगवान बुद्ध की प्रतिमा भी गांव के बिच मे स्थित है. गाँव में बहुत से प्रतिमा जगह जगह दिखाई पड़े.

3. सन 1902 में डेनमार्क के पुरातत्ववेत्ता, फोटोग्राफर मि. थिओडोर बलोच इस मंदिर को देखने और सर्वे के लिए आ चुके है. थिओडोर ने भी इस जगह को बहुत बड़ा आस्था और धार्मिक का केंद्र माना है.

माँ के द्वारा देवन मिश्र को श्राप देना

कहा जाता है की टिकारी राज सात आना के दरबारी देवन मिश्र को इसी मंदिर में माँ ने साक्षात् प्रकट हो श्राप दी थी..

मंदिर की लोकप्रियता-

आश्विन में शारदीय नवरात्र और चैत में बसंती नवरात्र के अवसर पर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ यहा जुटती है. श्रद्धालुगण 9 दिनों तक मंदिर परिसर में रहकर नवरात्र का पाठ करते हैं. इस दौरान श्रद्धालुगण अखण्ड दीप जलाते हैं. जो नौ दिनों तक अनवरत जलते रहता है.

हवनकुंड-

यहा एक त्रिभुजाकार विशाल हवन कुण्ड है जिसमें सालों भर आहुति डाली जाती है. मां तारा का यह हवनकुंड कभी नहीं भरता. इस हवनकुंड से राख कभी नहीं निकाली गई. आस्था और विश्वास का केन्द्र माना जाने वाली मां तारा देवी के दर्शन हेतु श्रद्धालुओं की अपार भीड़ लगी रहती है.

मंदिर में लगभग एक सदी पूर्व बली प्रथा कायम थी. उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के पंडित राहुल सांकृत्यायन के बौद्ध धर्म पर उनका शोध के लिए केसपा आगमन और उस समय उनके द्वारा बली प्रथा पर रोक लगाने के प्रयास सराहनीय रहा.

आश्विन माह में शारदीय नवरात्र में दर्शनीय स्थल-

आश्विन माह में शारदीय नवरात्र में मां तारा देवी की विशेष पूजा अर्चना की जाती है. इस अवसर पर श्रद्धालुओं व भक्तजनों द्वारा देवी के समक्ष घी के दिए जलाते हैं जो नौ दिन तक अनवरत जलता रहता है.

प्रत्येक वर्ष चैत्र नवरात्र एवं आश्विन नवरात्र के अवसर पर महाअष्टमी के दिन विशेष पूजा और भव्य सास्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है.

वर्ष भर मां तारा के दरबार में दूर-दूर से भक्तों का आने का सिलसिला लगा रहता है, नवरात्र के समय पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय दिखाई देता है और मंदिर के क्षेत्र में मेला लगा रहता है. यहां भारी भीड़ उमड़ती है. दूर-दूर से साधु और श्रद्धालुगण यहां पूजा करने, पाठ करने और हवन करने आते हैं.

माँ मनोकामना पूर्ण करती है-

मां तारा देवी किसी को निराश नहीं लौटाती. यहां मन्नत मांगने और मनोकामना पूरी होने के बाद माता का आशीर्वाद लेने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ती रहती है. जो दर्शनीय होता हैं.

Source:- टिकारी राज

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