भौतिकतावाद के चक्रव्यूह में खुद को खो देने की एक स्वरचित लघु कथा

 

इस भौतिकवादी संस्कृति में फँसकर कैसे हम खुद को भूल गए हैं…इसी पृष्ठभूमि पर रचित एक रचना. आशा करता हुँ पसन्द आएगी । आपसबकी प्रतिक्रियायें अपेक्षित हैं ।

मरदूद

अरे कहाँ मर गया रे मरदूद ? कब से आवाज दे रहा हुँ ,कमबख्त सुनता ही नहीं । जाने कहाँ मर मरा गया । कहाँ कहाँ नहीं ढुँढ़ा , कहाँ कहाँ नहीं खोजा तेरा कुछ पता ही नहीं चलता ।सालों बीत गये तुझे देखे , तुझसे बातें किए। पता नहीं तू जिन्दा भी है या नहीं ।
आँखे भर आती हैं आज भी जब तेरी याद आती है । नहीं भूला पाता तुम्हारे उस सादगी को , नहीं भूलती तेरी वो बेपरवाही।भरी दूपहरी में जब सारे बच्चे अपने घरों में होते , तुम गली में गिल्ली डंडा खेल रहे होते , भरी दुपहरी में दो तीन बच्चों को लेकर पहाड़ पर बैर तोड़ने चले जाते , कभी अपने दोस्त के भैंस के पीठ पर सोते हुए भैंस को नदी तक ले जाकर नहलाने का मजा लेते , कभी कहीं किसी के बरामदे में बैठकर व्यापार खेलते ।घंटों छत पर पतंगें उड़ाते रहते , होली के दिन मंडली के साथ होली गाते फिरते , गले में बोतल वाली पिचकारी लटकाये चौक तक घूमआते , कांधे पर झोला लटकाए मस्ती में गेहुँ पिसवाने जाने में भी तू कितना आनन्द में होता था ,मोहल्ले में किसी के घर शादी ब्याह हो तेरा वहाँ होना निश्चित होता , मस्ती का कोई मौका नहीं छोड़ते । माँ के डाँट डपट का तो तेरे उपर कोई असर ही नहीं होता । कापी किताबें स्कूल तो बस तेरे लिए मजबूरी के नाम थे । सारे घर वालों के नाक में दम कर रखा था तुमने । थोड़े बड़े हुए तो लगा तू सूधर जाएगा पर तू तो अलग ही मिट्टी का बना हुआ था । अब तूझे क्रिकेट का भूत सवार हो गया था । सुबह हो , दोपहर हो , शाम हो हर वक्त बस क्रिकेट ही सूझती तूझे । किसी की कुछ सुनता ही नहीं । हर वक्त अपने मन की करता । जब दसवीं पास होकल कालेज गया तो लगा अब तू सुधर जाऐगा पर तू तो अभी भी अपने मन का मालिक था । गजब तो तब हुआ जब तूने दिन रात के मेहनत से ग्रेजुएशन में यूनवर्सिटी में अव्वल आए । अब लगा तू शर्तिया सुधर गया । पर तू तो अब भी मस्ती में रहता रहा । अब भी तेरे अन्दर बचपन बाकी था ।यहाँ तक की तेरे पिता की मौत भी तूझसे तेरा बचपन नहीं छिन पाई । तेरे नौकरी की खबर सुनी मन बड़ा खुश हुआ कि चलो अब ये लड़का सुधर जाऐगा । वैसे मैं तूझे कभी बिगड़ा हुआ नहीं मानता था पर सोचता था तू थोड़ा संजीदा हो जाए , जिम्मेदार हो जाए ।
तेरी नौकरी लग गई , शादी हो गई , बच्चे हो गये , वर्षों बीत गए तुझसे मिले हुए ।
क्या हुआ बन्धु..किस सोच में गुम हो…अचानक तेरी आवाज सुनकर मैं चौंका था । मैंने ईधर उधर देखा कोई न था । सोचा काफी देर से तेरे बारे में सोच रहा था मेरा वहम होगा ।
मैं फिर से कुछ सोचने बैठा ही था कि फिर तेरी आवाज आई ..अरे पागल मैं यहीं हूँ , तू कहाँ खोया है । मैं तेरे अन्दर हुँ तू मुझे बाहर कहाँ ढुँढ़ रहा है । तू कहता रहता था न सुधर जा ,संजीदा हो जा , जिम्मेदार हो जा तो मैंने तेरी बात मान ली । देख आज मैं संजीदा हो गया हूँ , जिम्मेदार हो गया हूँ अब तो तू खुश है न । अरे ..पगले तू रो क्युँ रहा है , तुझे तो खुश होना चाहिए कि मैं बदल गया ..फिर ये आँसू क्यूँ ? यार तू रो मत , मैं हर वक्त तेरे अन्दर हूँ , जब जी चाहे मुझसे मिलने आ जाना ।जाता हुँ , नहीं फिर तू बोलेगा मैं मस्ती कर रहा हुँ ।
आँखों से अविरल बहते आँसूओं के बीच मैं कुछ न कह पा रहा था । कैसे कहता कि तू मेरे अन्दर है पर कितना दूर है , कैसे कहता कि तेरी उस मस्ती और जिन्दादिली की जिसे मैंने ही मार दिया आज कितनी याद आती है , कैसे कहता आसमान में उड़ती पतंगों को देखकर उनमें तेरी तस्वीर दिखती है , कैसे सुनाऊँ उन बेरंगी होलीयों की बातें , क्या बताऊँ कि बच्चे अब गिल्ली डंडा नहीं खेलते , कैसे बताऊँ की माँ अब नहीं डाँटती बस सूनी आँखों से तेरी राह देखती है । उस घर में जहाँ तेरे चलते धमाचौकड़ी मची रहती थी अब श्मशान सा सन्नाटा छाया रहता है । कह भी तो नहीं सकता तू वापस आ जा , मैंने ही तो तुझे मारा है । मैंने ने ही तो अपने बचपन , अपनी मस्ती , अपने जिन्दादिली का गला घोंटा है ।

सुनिल कुमार सिन्हा

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