कहानी टिकारी राज का प्रथम राजा:- राजा वीर सिंह की…

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वीर सिंह उर्फ़ धीर सिंह मूलतः उत्तर प्रदेश के निवासी थे. ये धर्मवीर सिंह के नाम से भी जाने जाते थे। यह उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिला के टिकरा, द्रोणटिकार नामक स्थान के भूमिहार थे। द्रोनकटार भूमिहार जिसे बोलचाल की भाषा में डोमकटार भूमिहार के नाम से भी पुकारते हैं। डोमकटार भूमिहार भरद्वाज गोत्र के होते हैं। उनका परिवार बहुत साधारण था। उनके पिता का नाम चौधरी अजब सिंह था। वीर सिंह बचपन से बहुत ही कर्मठी थे। वहां पर वीर सिंह की परिवार के लोग बहुत ही तंगी हालत में अपना जीवन यापन कर रहे थे और उनको अपनी परिवार की तंगी हालत को देखा नहीं गया इसलिय वे निराश हो कर अपनी मूल पैत्रिक स्थान यानी मातृभूमि को छोड़कर रोज़ी-रोटी के तलाश में गया जिला में आ कर बस गए। वे यहाँ आ कर सर्वप्रथम गया पाल पंडा के यहाँ ठहर कर अपने पूर्वजों के नाम का सत्रह दिन का पिंड तर्पण किया। गया में ठहर कर उन्होंने बहुत ही मेहनत किया और अपनी मेहनत के बल पर यहाँ के लोगों के बीच अपनी पहचान बनायीं।

वीर सिंह मजबूत कद काठी, साहसी, बलशाली एवं असाधारण व्यक्ति थे, इसलिए कुछ दिनों के बाद अपने मजबूत कद काठी और ताकतवर होने के कारण वे पहले गया में मुगल सेना के कैंप में सैनिक पद पर भरती हुए फिर बाद में स्थानीय पाली गाँव के नवाब के यहाँ सैनिक पद पर नियुक्त हो गये, पाली के नवाब के यहाँ काम करते हुए, धीरे धीरे मेहनत के बल पर तरक्की करते हुए वे सन 1708 में उनके सेना के सेनापति बन गए। उनकी वीरता और मेहनत का चर्चा अजीमाबाद (पटना) के सूबेदार हुसैन अली खान के पास पहुंचा,

अजीमाबाद के सूबेदार हुसैन अली खान ने वीर सिंह को लाव के आस पास के गाँव के देखभाल के लिए अपना सिपह्सलाह्कार नियुक्त कर दिया. इसी समय मराठा लड़ाका रघुजी भोसंले ने मगध पर चढ़ाई कर दिया था जिसमें नवाब के सेना में रहते हुए वीर सिंह ने डटकर मराठा सैनिकों से लोहा लिया और उनकों युद्ध में हरा कर मगध से खदेड़ दिया। अब वीर सिंह का मराठा से युद्ध करने के बाद उनका नाम काफी प्रसिद्ध हो गया और बहुत दूर दूर तक के लोग उन्हें बहुत बड़ा वीर और असाधारण योधा के रूप में जानने लगे।

राजा वीर सिंह की वीरता की चर्चा चारों तरफ होने लगी और उनकी दूरदर्शी एवं वीरता के कारण ही उनकी शादी अजीमाबाद (पटना) के नायब सूबेदार राजा चौधरी कंचन सिंह के पुत्री के साथ हुई थी. राजा कंचन सिंह की अजीमाबाद के सूबेदार हुसैन अली खान से बहुत गहरी दोस्ती थी।

अजीमाबाद के सूबेदार हुसैन अली खान की नियुक्ति सन 1708 में औरगंजेब के बेटा बहादुर शाह के द्वारा हुयी थी. मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ने उनके बड़े भाई सैयद अब्दुल्लाह खान को सन 1711 इसवी में इ्लाहाबाद में सूबेदार पद नियुक्त किया गया था।

1702 ई. में मुगल सम्राट औरंगजेब के पौत्र राजकुमार अज़ीम-उस-शान को बिहार का सूबेदार नियुक्‍त किया गया। प्रशासनिक सुधार उन्होंने विशेष रूप से पटना में किया फलतः पटना का नाम अपने नाम के अनुसार बदलकर ‘अजीमाबाद’ रख दिया। उसने नगर के सौंदर्यीकरण में उस समय १ करोड़ रूपया खर्च किये।

राजा कंचन सिंह अजीमाबाद के सूबेदार सैयद हुसैन अली खान के दाहिना हाथ थे। दिल्ली के मुग़ल बादशाह के दरबार में सूबेदार हुसैन बन्धुओ का पकड़ 1708 इसवी से 1720 इसवी तक बना हुआ था इसलिय राजा कंचन चौधरी का दिल्ली के मुग़ल बादशाह के राज दरबार में पहुँच बन चूका था।

वीर सिंह की राजा कंचन सिंह के यहाँ शादी करने के बाद उनकी प्रसिधी एवं ताकत काफी बढता जा रहा था। कंचन सिंह के द्वारा वीर सिंह अपनी पहुँच अजीमाबाद के सूबेदार हुसैन अली खान तक बना लिए थे।

इस कालखंड के आस पास दिल्ली के मुग़ल साम्राज्य का पतन, औरंगज़ेब के शासन काल (1658-1707) में ही प्रारंभ हो गया था। इनके शासन काल में सैनिक, जागीरदारों तथा प्रशासनिक अधिकारीयों की संख्या अपेक्षाकृत बढ़ गयी थी। उन सबको जागीर देने के लिय पर्याप्त ज़मीनें नहीं रह गयी थी। जागीरदारों की आय कम होती चली आ रही थी। राज दरबार की हालत इतनी बदतर हो गयी थी की सैनिकों को वर्षों तक का वेतन नहीं मिल पा रहा था। जिससे मुग़ल सेना के सैनिकों में असंतोष दिन पर दिन बढ़ता जा रहा था. मुग़ल सैनिक राज्य के नागरिकों को डरा धमका कर लूट खसोट कर ही अपना गुज़ारा करते थे।

मुग़ल साम्राज्य के बादशाह को अपने सूबेदार और जागीरदार पर से पकड़ दिन पर दिन कमजोर होता जा रहा था। अब जागीरदारों ने जागीर को अपने पुत्र तक को हस्तांतरित करना शुरू कर दिया था। जबकि जागीर राजकीय सेवा करने के बदले सशर्त के साथ जागीरदार को दिया जाता था। सेवाशर्त के अनुसार जागीरदार की मृत्यु के उपरान्त जागीर दोबारा राजकीय सम्पति बन जाती थी। देश के कई प्रान्तों में जागीरदार की मनमानी होनी शुरू हो गयी थी। उन्होंने जागीर को अपने पुत्र के नाम से करनी शुरू कर दी थी।

राज के सैनिक और अधिकारीगण अपना डर दिखा कर किसानों से राजस्व के रूप में कर जबरदस्त वसूलना शुरू कर दिया था। उनलोगों के अत्याचार से तंग आ कर किसान अपने गाँव छोड़ कर भागने लगे थे। जो लोग गाँव छोड़ कर नहीं भागे, उन्हें भी चैन से नहीं रहने दिया गया। गाँव छोड़ कर भाग जाने वाले किसानों से भी बकाया मांगी जाने लगी। किसानों के द्वारा गाँव छोड़ कर भाग जाने के बाद साम्राज्य के कई हिस्से में सन 1702 से 1704 के बीच एकाएक जबरदस्त अकाल पड़ा, इस अकाल में पूरे भारत में करीब बीस लाख लोग मारे गए।

बंगाल के नबाब मुर्शिद कुलि जाफर खान (1703-1727) ने औरगज़ेब द्वारा भेजे गए अपने उतराधिकारी को बंगाल से खदेड़ दिया था। औरंगज़ेब की सैन्य शक्ति में 60,000 घोड़े, 1,00000 पैदल सैनिक, 50,000 ऊँट, 3,000 हाथी थे। औरगज़ेब के विशाल सेना रहने के वावजूद मुर्शिद कुली ख़ाँ बंगाल का वास्तविक शासक बन बैठा था। नवाब बनने के बाद ही उसने खुद को केंद्रीय नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त कर लिया था। मुर्शिद कुलि जाफर खान ने सम्राट को सिराज देना बंद कर दिया था। साथ ही साथ बिहार और उड़ीसा को भी अपने राज्य में मिला लिया था। उसने 1714 से 1718 के बीच मुर्शिदाबाद के नाम से नई राजधानी की स्थापना की।

50 वर्ष तक शासन करने के बाद औरंगज़ेब की मृत्यु दक्षिण के अहमदनगर में 3 मार्च सन् 1707 ई. में हो गई. दौलताबाद में स्थित फ़कीर बुरुहानुद्दीन की क़ब्र के अहाते में उसे दफना दिया गया। उसकी नीति ने इतने विरोधी पैदा कर दिये, जिस कारण मुग़ल साम्राज्य का अंत ही हो गया। औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात्‌ के कुछ वर्षों में मुगल साम्राज्य धीरे धीरे उसके सूबेदारों के हाथ आ गया था। इन सूबेदारों में तीन प्रमुख थे। एक तो दक्षिण का सूबेदार जो हैदराबाद में शासन करता था; दूसरा बंगाल का सूबेदार जिसकी राजधानी मुर्शिदाबाद थी और तीसरा थी अवध का नवाब जिसकी राजधानी लखनऊ थी।

औरंगज़ेब के उतराधिकारी बहादुर शाह (1707-1712) के राज काल में मुग़ल सम्राट कठपुतली से ज्यादा कुछ नहीं रह गए थे। दिल्ली सल्तनत का केंद्र शक्तिहीन हो चूका था और दिल्ली साम्राज्य के अलग अलग प्रान्तों में छोटी छोटी सामंती शक्तियां सर उठा रही थी। नए नए लोग अपनी सेना को गठन करके जागीर, गढ़ या परगना के गाँव पर हमला कर रोज़ नए-नए स्वतंत्र प्रदेश बनाते जा रहे थे। इसके बावजूद मुग़ल साम्राज्य के सार्वभौमिकता के मिथक को स्वीकारा जा रहा था।

इसी घटना क्रम के फायदा उठा कर वीर सिंह ने पाली के नवाब के यहाँ कमांडर पद की नौकरी छोड़ दी थी और अजीमाबाद के सूबेदार हुसैन अली खान के समर्थन पा कर, वीर सिंह ने अपने घर लाव में अपनी एक निजी सेना का गठन कर लिया था। अब वे एक सैनिक प्रमुख के रूप में एक शक्ति का केंद्र स्थापित कर लिए थे। पाली के नवाब के यहाँ दुश्मनों ने हमला बोल दिया था, वहां से दुश्मनों को खदेरेने में वीर सिंह के सेना का भी बहुत बड़ा हाथ था। वीर सिंह का कद दिन पर दिन काफी बढ़ता जा रहा था। वीरसिंह अब काफी धनवान और ताकतवर हो चुके थे। अब तक ये एक पुत्र त्रिभुवन सिंह के पिता भी बन चुके थे।

वीर सिंह ने अजीमाबाद के सूबेदार और कंचन सिंह के समर्थन पा कर अपनी सेना को ले कर पहला हमला लाव के नवाब के गढ़ पर किया, नवाब को पराजित करते हुए उनके लाव के गढ़ पर कब्ज़ा कर लिया और कब्ज़ा करने के बाद उसे वे अपना निवास स्थान बना लिया. यहाँ रहते हुए वीर सिंह का दूसरा पुत्र सुंदर सिंह का जन्म 1711 में और तीसरा पुत्र छतर सिंह का जन्म 1713 में हुआ था. वीर सिंह ने लाव के दक्षिणी भाग में स्थित गढ़ को और मजबूत रूप से निर्माण करवाया. इस गढ़ को आज के समय लोग इसे सुंदर सिंह गढ़ कहते है.

सन 1712 ई. में दिल्ली में मुग़ल बादशाह बहादुरशाह की मृत्यु हो गयी तो उनका पुत्र अजीम उश शान ने भी दिल्ली की गद्दी प्राप्त करने की कोशिश की, लेकिन वह असफल होकर मारा गया. तब दिल्ली की गद्दी पर जहाँदरशाह बादशाह बना तब अजीम उश शान का पुत्र फर्रुखशियर पटना में था.

अजीम उश शान का पुत्र फर्रूखशियर का जन्म में ही हुआ था. वह पहला मुगल सम्राट था जिसका औपचारिक राज्याभिषेक सन 1712 में बिहार के पटना में हुआ था. उसने अपना राज्याभिषेक किया और आगरा पर अधिकार के लिए चल पड़ा. आगरा के समीप फर्रुखशियर ने जहाँदरशाह को पराजित कर दिल्ली का बादशाह बन गया.

1712 ई. से 1719 ई. तक फर्रूखशियर दिल्ली का बादशाह बना रहा इसी अवधि में बिहार में चार गवर्नर- खैरात खाँ- 1712 ई. से 1714 ई. तक, मीलू जुमला- 1714 ई. से 1715 ई. तक, सर बुलन्द खाँ-1716 ई. से 1718 ई. तक बना.

इस दौरान जमींदारों के खिलाफ अनेक सैनिक अभियान चलाए गये. भोजपुर के उज्जैन जमींदार सुदिष्ट नारायण का विद्रोह, धर्मपुर के जमींदार हरिसिंह का विद्रोह आदि प्रमुख विद्रोही थे. इन विद्रोहियों का तत्कालीन गवर्नर सूर बुलन्द खाँ ने दमन किया. सूर बुलन्द खाँ के पश्‍चात्‌ खान जमान खाँ 1718-21 ई. में बिहार का सूबेदार बना. अगले पाँच वर्षों के लिए नुसरत खाँ को बिहार का नया गवर्नर बना दिया गया. बाद में फखरुद्दौला बिहार का सूबेदार बनकर उसने छोटा नागपुर, पलामू (झारखण्ड) जगदीशपुर के उदवन्त सिंह के खिलाफ सैन्य अभियान छेड़ा.

वीर सिंह का ताकत दिन पर दिन लगातार काफी बढ़ता जा रहा था, उन्होंने लाव के अगल बगल के कई ग्रामों पर हमला करते हुए उसे अपने कब्ज़े में ले लिया था. उन्हें सबसे बड़ी कामयाबी सन 1718 में हुई जब वे सोनौत परगना के फौजदार मकसूद खान गढ़ पर चढ़ाई कर दिया और फौजदार को मार कर सोनौत परगना को जीत लिया. अब वह पुरे सनौत परगना के मालिक हो गए और मकसूदपुर के सैन्य छावनी के साथ साथ उसमें रह रहे सैन्य बल भी अपने कब्जे ले लिया था. इसके बाद वीर सिंह ने सोनौत परगना के अगल बगल के परगनाओं के कई गाँव पर हमला कर के अपने कब्ज़े में ले लिया था. इसी तरह वीर सिंह ने अपने होने वाले संभावित दुश्मनों को भी पराजित कर उनके जागीर को अपने राज में मिला लिया था. अब तक वीर सिंह मगध के शक्ति के केंद्र बन चुके थे. सोनौत परगना जितने के बाद सन 1719 में दिल्ली के मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह ने अपने राज दरबार में वीर सिंह को बुला कर, उनके वीरता एवं साहस पर खुश हो कर उन्हें खिल्लत से सम्मान दिया और उन्हें राजा का पदवी भी प्रदान की.

राजा के पदवी मिलने के बाद सन 1720 में वीर सिंह अपने राज की राजधानी एवं किला का निर्माण शुरू करने के लिए अपने राज पुरोहित श्री श्री 108 विद्या चरण भारती के साथ जगह की तलाश में निकल पड़े, मोरहर नदी से 1 किमी पच्छिम जंगल में एक बहुत बड़ा प्राचीन गढ़ रूपी टिल्हे पर उन्होंने देखा की एक बगुला जो एक बाज़ को मार रहा है, उसे देखकर उनके राज पुरोहित को इस जगह में कुछ खासियत दिखाई पड़ा. उन्हें यह प्राचीन टिल्हे पर राजा वीर सिंह के किला बनाने के लिए पसंद आया. राज पुरोहित के सलाह के अनुसार राजा वीर सिंह उस जगह पर अपने किला का निर्माण शुरू करवा दिया और जहाँ पर उन्होंने किला का निर्माण शुरू करवाया, उस जगह का नाम उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिला के टिकार नामक जगह के निवासी होने के कारण टिकारी रख दिया और बाद में वीर सिंह ने अपने किला का नामकरण भी टिकारी राज कर दिया. अतः टिकारी राज और टिकारी शहर के निर्माणकर्ता राजा वीर सिंह ही हैं.

राजा वीर सिंह की मृत्यु सन 1729 इसवी में हो गयी थी. इनकी मृत्यु के बाद उतराधिकार के रूप में उनके सबसे बड़े लड़के त्रिभुवन सिंह टिकारी राज के राजा हुए.

राजा वीर सिंह के तीन लड़के हुए.

1. त्रिभुवन सिंह,
2. सुंदर सिंह,
3. छतर सिंह.

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