“टिकारी राज किला” आइये जाने इसका स्‍वर्णिम इतिहास

“टिकारी राज के अंतिम नरेश कैप्टन गोपाल शरण सिंह अंग्रेज शासन काल में अपनी बहादुरी और विपरीत दिशा में साठ किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से कार चलाने के लिए प्रसिद्ध थे। अद्वितीय रंग, कौशल और बहादुरी के लिए भी गोपालशरण सिंह चर्चित थे। इनका राज्य अनूठी वासू शिल्प के लिए भी ख्यात था। गोपाल शरण सिंह को सामरिक सुरक्षा का अदभुत रचनाकार और योद्धा माना जाता था, लेकिन आज गोपाल शरण सिंह तथा उनके किले की तमाम खूबियां बिखरती जा रही हैं।”

“टेकारी” ज़िला मुख्यालय गया से क़रीब 30KM पश्चिम में टिकारी अनुमंडल मुख्यालय में स्थित है। इसके अंतिम राजा कैप्टन गोपाल शरण सिंह इतिहास के पन्नों में तो द़फन हो चुके हैं, लेकिन खंडहर में तब्दील होने के बावजूद टिकारी राज आज भी अपनी प्राचीनतम भव्यता का अहसास हर किसी को कराता है। इस किले में 52 आंगन थे।

कहा जाता है कि टिकारी किला भूमिगत सुरंग के माध्यम से टिकारी-पंचानपुर मार्ग पर स्थित रामेश्वर बाग से जुड़ा है। सात आना किला परिसर में बने स्नान घर में रानी स्नान करती थी। यहां सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए एक नाच घर भी बना था, जहां समय-समय पर राजा द्वारा नृत्य एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। टिकारी राज का बिखराव अंतिम राजा कैप्टन गोपाल शरण सिंह के निधन के बाद से ही शुरू हो गया था। स्थिति यहां तक आ गई कि राज-काज के लिए राज के कुछ हिस्से को मिथिला राज के पास गिरवी रखा गया था।

टिकारी राज के अंतिम नरेश कैप्टन गोपाल शरण सिंह अंग्रेज शासन काल में अपनी बहादुरी और विपरीत दिशा में साठ किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से कार चलाने के लिए प्रसिद्ध थे। अद्वितीय रंग, कौशल और बहादुरी के लिए भी गोपालशरण सिंह चर्चित थे. इनका राज्य अनूठी वासू शिल्प के लिए भी ख्यात था। गोपाल शरण सिंह को सामरिक सुरक्षा का अदभुत रचनाकार और योद्धा माना जाता था, लेकिन आज गोपाल शरण सिंह तथा उनके किले की तमाम खूबियां बिखरती जा रही हैं। उपेक्षा के कारण खंडहर हो चुकी टिकारी किले की सुरंग, मुख्य प्रवेश द्वार का भग्नावशेष, कोषस्थल, बारूदखाना, तालाब, बावन आंगन, सतघरवा, शक्तिपीठ (योगी), इच्छादयिनी कुआं, सुरक्षात्मक खाइयां, तिलस्म कुआं, दरवाजा, भूमिगत रास्ता आज भी लोगों को आकर्षित करता है।

बताया जाता है कि टिकारी राज 852 वर्गमील में फैला था। जिसके अंतर्गत 715 राजस्व गांव आते थे। इन गांवों से साढ़े सात लाख की वार्षिक आय होती थी। 1940 में यह आय ब़ढकर क़रीब 50 लाख हो गई थी। प्रथम विश्वयुद्ध में टिकारी राज ने अंग्रेजी हुकूमत को 30 हज़ार मन खाद्यान्न तथा पांच लाख रुपये मदद में दिए थे।

इस किले में स्थित इच्छादायिनी कुएं के संबंध में बताया जाता है कि उसके गर्भ में हीरे जवाहरत, सोने-चांदी, प्राचीन सिक्के आदि पड़े हैं, जिसकी रक्षा कुएं के पायदान पर स्थित अष्टधातु पर बैठे दो नागराज करते थे।

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